मंगलवार को एक ऐसा दावा सामने आया जिसने राजनीतिक वातावरण को फिर से गरम कर दिया — निशिकांत दुबे, भारतीय जनता पार्टी के सांसद, ने आरोप लगाया कि अरविंद केजरीवाल, दिल्ली के मुख्यमंत्री, ने हेमंत सोरेन को दिल्ली से रांची भागने में मदद की। ये बात लाल किले के पास एक संवाददाता सम्मेलन में कही गई, जहां दुबे ने यह भी कहा कि केजरीवाल ने सोरेन को सड़क मार्ग से शहर छोड़ने की व्यवस्था की। लेकिन क्या ये सच है? या ये सिर्फ एक राजनीतिक शॉट है — जिसका लक्ष्य 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष को कमजोर करना है?
क्या हुआ था जनवरी 2024 में?
जनवरी 2024 में, हेमंत सोरेन को झारखंड में एक कथित जमीन घोटाले के मामले में ईडी ने हिरासत में लिया। लेकिन गिरफ्तारी से ठीक पहले, सोरेन ने राज्यपाल के पास जाकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया। ये चाल अचानक आई — और इसके बाद ही ईडी की टीम राजभवन पहुंची। इस टीम का नेतृत्व कपिल राज कर रहे थे, जो 2009 बैच के आईआरएस अधिकारी थे। ये वही कपिल राज हैं जिन्होंने बाद में अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के लिए 21 मार्च 2024 को दिल्ली के उनके बंगले पर तलाशी ली।इसलिए जब दुबे कहते हैं कि केजरीवाल ने सोरेन को भागने में मदद की, तो ये बात अजीब लगती है। क्योंकि अगर केजरीवाल ने सोरेन को बचाने की कोशिश की होती, तो फिर उन्हें खुद क्यों गिरफ्तार किया गया? और क्यों उसी टीम के नेता ने दोनों की गिरफ्तारी की?
मुलाकात या साजिश?
2 जून 2023 को, केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने रांची में सोरेन से मुलाकात की। झारखंड सरकार ने इसे सिर्फ शिष्टाचार मुलाकात बताया। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ये मुलाकात असल में विपक्षी दलों के बीच गठबंधन की तैयारी का हिस्सा थी। तब तक ईडी दोनों मुख्यमंत्रियों पर नजर रख रही थी — और अब दोनों गिरफ्तार हो चुके हैं।केजरीवाल ने सोरेन की गिरफ्तारी पर तुरंत प्रतिक्रिया दी — कहा कि ये गलत तरीके से किया गया है, और तानाशाही बढ़ रही है। उन्होंने यह भी कहा कि ईडी की कार्रवाई राजनीतिक बदलाव के लिए इस्तेमाल हो रही है। लेकिन दुबे का दावा इसके ठीक उल्टा है — कि केजरीवाल ने सोरेन को बचाने की कोशिश की।
क्यों अचानक ये दावा?
ये दावा तभी सामने आया जब केजरीवाल की जेल से रिहाई की आशा थी। और जब विपक्षी दलों के बीच इंडिया गठबंधन की ताकत बढ़ रही थी। भाजपा के लिए, एक ऐसा आरोप जो केजरीवाल को एक बदमाश बना दे — जो अपने साथी को भागने में मदद करता है — वो बहुत कारगर हो सकता है।लेकिन यहां एक बड़ा सवाल है: किसी ने इस दावे का कोई सबूत नहीं दिया। कोई फोन कॉल रिकॉर्ड, कोई वीडियो, कोई गवाह नहीं। केवल एक बयान — जिसमें शब्द ‘भागने’ का इस्तेमाल किया गया, जो बेहद भावनात्मक और अपमानजनक है।
क्या ये सिर्फ एक रणनीति है?
राजनीतिक विश्लेषक अनिल शर्मा (नाम बदला गया) का कहना है: “ये आरोप किसी तथ्य पर नहीं, बल्कि एक भावना पर आधारित है — भाजपा चाहती है कि लोग सोचें कि केजरीवाल एक बचाव वाला नेता है, न कि एक न्याय के लिए लड़ने वाला।”यहां एक और बात जोड़ना जरूरी है — कपिल राज ने लगभग 16 साल की सेवा के बाद इस्तीफा दे दिया है। और उन्होंने दिल्ली में जीएसटी खुफिया शाखा में काम किया। इसका मतलब ये नहीं कि वो किसी के साथ साजिश कर रहे थे — बल्कि वो एक अधिकारी थे जिन्हें दो अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्रियों की जांच करनी पड़ी।
अगर केजरीवाल ने सोरेन को भागने में मदद की होती, तो वो खुद अपनी गिरफ्तारी के लिए अपने आप को नहीं तैयार करते। इस बात का कोई तार्किक समझ नहीं है।
अगला क्या होगा?
अब ये सवाल उठ रहा है — क्या कोई जांच होगी? क्या दुबे अपने दावे के सबूत पेश करेंगे? या ये सिर्फ एक ट्विटर ट्रेंड बन जाएगा, जैसे कई अन्य राजनीतिक दावे हुए हैं?इस बीच, झारखंड में सोरेन के खिलाफ मामला अभी भी चल रहा है। और केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद दिल्ली में आम आदमी पार्टी का नेतृत्व एक नए चेहरे के साथ चल रहा है। दोनों नेता अभी भी जेल में हैं — लेकिन उनके बीच की रिश्ते की तस्वीर अब एक अज्ञात के रूप में बनी हुई है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या निशिकांत दुबे ने अरविंद केजरीवाल के खिलाफ कोई सबूत पेश किया है?
नहीं, दुबे ने कोई फोन रिकॉर्ड, वीडियो, या गवाह नहीं पेश किया है। उनका दावा केवल एक संवाददाता सम्मेलन में बयान के रूप में आया है। इस तरह के आरोपों के लिए कानूनी सबूत जरूरी होते हैं, जो अभी तक उपलब्ध नहीं हैं।
हेमंत सोरेन और अरविंद केजरीवाल के बीच क्या राजनीतिक संबंध थे?
2 जून 2023 को दोनों नेताओं के बीच एक शिष्टाचार मुलाकात हुई, जिसे झारखंड सरकार ने सामान्य राजनीतिक संपर्क बताया। दोनों आम आदमी पार्टी और इंडिया गठबंधन के हिस्से थे, लेकिन उनके बीच कोई गहरी सामाजिक या राजनीतिक जुड़ाव का सबूत नहीं मिला है।
कपिल राज की भूमिका क्या थी दोनों मामलों में?
कपिल राज, आईआरएस अधिकारी, दोनों मामलों — हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी और अरविंद केजरीवाल की तलाशी — में मुख्य अधिकारी थे। वो ईडी की एक टीम के हिस्से थे, जिन्हें नियमित रूप से राजनीतिक नेताओं की जांच के लिए भेजा जाता था। उनकी भूमिका न्यायिक और प्रशासनिक थी, न कि राजनीतिक।
क्या ये दावा लोकसभा चुनाव से जुड़ा है?
हां, ये दावा चुनाव के बाद के राजनीतिक वातावरण का हिस्सा है। भाजपा विपक्षी नेताओं की छवि को नुकसान पहुंचाने के लिए ऐसे आरोपों का इस्तेमाल कर रही है। लेकिन इसका असर लोगों पर अलग-अलग हो रहा है — कुछ इसे बयान मान रहे हैं, तो कुछ इसे राजनीतिक शोर कह रहे हैं।
क्या हेमंत सोरेन को गिरफ्तारी से पहले इस्तीफा देना जरूरी था?
नहीं, ये जरूरी नहीं था। लेकिन उन्होंने इस्तीफा देकर एक नैतिक संकेत दिया — कि वो अपने पद को बरकरार रखने के लिए नहीं, बल्कि न्याय के लिए अपने आप को अलग कर रहे हैं। ये नैतिक दबाव बाद में केजरीवाल पर भी पड़ा।
क्या ईडी की कार्रवाई राजनीतिक है?
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ईडी की कार्रवाइयां राजनीतिक लक्ष्यों के साथ जुड़ी हैं — खासकर जब दो अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री एक ही समय में गिरफ्तार हो जाएं। लेकिन इसका निर्णय न्यायालय ही करेगा।